Hi Friends,

Even as I launch this today ( my 80th Birthday ), I realize that there is yet so much to say and do.

There is just no time to look back, no time to wonder,"Will anyone read these pages?"

With regards,
Hemen Parekh
27 June 2013

Wednesday, 14 March 1984

महफ़िल

किसे खबर कहाँ  जा रहा हूँ
तुम्हारी महफ़िल में भी तो
भूलकर आया हूँ -

बिन बुलाये आया ये सोचकर
अगर मेरा जाम खाली रहा
तो खैर,
तुम्हारा ये असूल है :

मगर ये भी तो सोचो की
औरोने तुम्हारी महफ़िल को
मैखाना बना रखा है -

जब मैंने जीते जी
अरमानोकी मज़ार  पर
तुम्हारा नाम लिखा है !

क्या तुम्हे ये तो कबूल है ?



Monday, 5 March 1984

अमानत

सवाल ये नहीं की
कहा तक मै तुज़े  प्यार करता रहूँगा -

सवाल ये है की
कहा तक मै  जिन्दा  रहूँगा !

इस ज़िन्दगी पर मेरा कोई अधिकार नहीं
ये तुम्हारी अमानत है ,
एक न एक दिन
तुम्हे लौटाना है -

अच्छी तरह
इसे सम्हालने की कोशिश में
अगर असफल  रहा
तो क्या  मुझे दोष दोगी ?

तुमसे प्यार करते करते
तुम्हारी अमानत का खयाल
कुछ कम किया
इसका अफ़सोस मुझे नहीं है।

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05  March   1984