Hi Friends,

Even as I launch this today ( my 80th Birthday ), I realize that there is yet so much to say and do.

There is just no time to look back, no time to wonder,"Will anyone read these pages?"

With regards,
Hemen Parekh
27 June 2013

Sunday, 21 April 1985

तुम जो आ रही हो !

फिर एकबार
गुलमोर में फूल आ गए है ,

तुम जो आ रही हो !

कुछ दिन पहेले
इस ज़ाड़ पर
एक सूखी पत्ती भी ना थी ,

आज डाली डाली पर पत्ती है
और पत्ती पत्ती पर फूल है  ;

अगर इन सब को
तुम्हारे आने की प्रतिक्षा हो ,
तो भला , मेरा क्या हाल होगा  ?

मगर
ना तो गुलमोर बोल शकता है
ना मै  ;

उस फूल ,
जो तुम्हारे ओठो की याद दिलाते है
बस उसे बार बार चूम लेता हूँ  ;

जब तुम चली जाओगी
फूल मूर्ज़ा जायेंगे ,

तुम्हारी यादों को
धुन्ढ़ते धुन्ढ़ते ,
मै अकेला
सूने आकाश में उड़ता रहूंगा



रेल की पटरिया

मेरे तेरे जीवन के पथ
चले जा रहे है समान्तर ;

जैसे के रेल की पटरिया ,
जो कभी दूसरी पटरिया से जूड जाती है
मगर एक दूजे से नहीं  !

काश !
हम नदि के दो किनारे होते ,

कभी ना कभी
समंदर से मिलके
एक दुसरे को मिल ही जाते  !

अगर हमारा अलग अस्तित्व  है 
तो क्या हुआ  ?

अब तो इसी आश में जी रहा हूँ
की
जीते जी जिसे जोड़ ना शके

( कैसे जोड़ते ?
  कितने डिब्बे पटरियों से उछल कर
  छिन्न भिन्न हो जाते ! )

वो दो जीवन के नाम को
मौत के बाद जोड़कर ,

रिश्ते वालो
हमारे उस त्याग की कदर करे ,

जो खुद को जलाके
उनको रौशनी देता रहा


तुम्हारी उम्र

तब तुम्हारे बाल
लम्बे , काले  ,  घने थे ,
जब मैंने तुम्हे सबसे पहेले देखा  ;

आज वो बाल नहीं,
मगर तुम्हारी आँखों में
उस दिन ,
जिस प्यार का साया देखा था
वो आज भी है  :

उस गहराइओ में डूब कर
बाहरी दुनिया को ,
करीब करीब भूलसा गया  ;

ये भी के ,
वकत गुजरा चला जा रहा है  ;

ये भी  के ,
तुम्हारे वो काले ज़ुल्फे
कभी
तुम्हारे बदन की सफ़ेदाइओ को चुराके
खुद सफ़ेद हो जायेंगे  --

मेरे खयालो में
तुम्हारी उम्र , अब भी
बीस के आसपास ही है 

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21  April   1985

मज़ार के उसपार

क्या करना था ,
क्या कर बैठा  ?

संसार में आकर
सयाना होना था ,
तुम्हे देखते ही
दीवाना हो गया  !

मगर मेरा दीवानापन ,
कोई पहेचाने भी तो
कैसे पहेचाने  ?

सयानेपन की वरदी पहेने हुए हूँ  !

अब तो चंद राते बाकी है ,
शोचता हु तो
जैसे जीवन की
सब बाते बाकी है  !

जिसे पाना था उसे खोकर
लगता है
जिंदगी की सब मुरादे बाकी है  ;

खयालो ही खयालो में
तमन्नाओ की चली बारात
दुल्हन उस दिन भी थी
आज भी हो

तुम्हे कबूल हो तो
मज़ार के उसपार
दीवाने का साथ भी हो  ?

Sunday, 14 April 1985

ग़मों का ये गुलदस्ता

कई बाते याद आती है
कुछ कहेने जैसी ,

कुछ
तुम्हारे मुह से फिर एक बार
सुनने जैसी  ;

जिस जगह
मैंने तुम्हे पहेली बार देखा था ,
उस जगह ,

जभी जभी मौक़ा मिले ,
जा कर खडा हो जाता हूँ ,

तुम्हारे खयालो में डूब जाता हूँ  ;

आंसू ओ तो दिखा नहीं शकता
अफ़सोस इस बात का नहीं ,

अगर अफ़सोस है तो ये के
जिस आंसू को सींच कर
बागबान ने
ग़मों का ये गुलदस्ता बनाया,

तुम्हारे जन्मदिन पर भी
इसे
पेश नहीं कर पाता  हूँ  !

Friday, 12 April 1985

मै उस हवा हूँ

धरती गगन से प्यार करती है ,
गगन धरती से  ;

मगर
गगन के हाथ नहीं ,
इसलिए गगन ,
धरती के पूरे बदन को
छुए हुए है  ;

मेरे हाथ भी किसी ने काट दिए ,

मैं भी , मनो:मन
तुम्हारे पूरे बदन को
चूमे हुए हूँ  ;

जिस हवा ने तुम्हे घेरा है
मै उस हवा हूँ  ;

खाली बाहरी शरीर को नहीं ,
हर सांस में घूल कर
तुम्हारे अस्तित्व के
हर कोने कोने में
फ़ैल जाता हूँ  ;

तुम्हारी रगरग में
लहू बनके
तुम्हारी रक्षा करूंगा

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Juhu Shack
Mumbai
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12  April  1985