Hi Friends,

Even as I launch this today ( my 80th Birthday ), I realize that there is yet so much to say and do.

There is just no time to look back, no time to wonder,"Will anyone read these pages?"

With regards,
Hemen Parekh
27 June 2013

Saturday, 20 July 1985

मुज़े कबूल है मेरी गुस्ताखी

अबतक तो आँखों की पलकों पर
हमें उठाये हुए हो ;

अगर आँखे बन्ध कर दोगी
तो हम कहाँ जाके गिरेंगे  ?

हमने तो खौसला पहेले से ही
जला रखहा है ,

अब चाहो तो पांखे भी जला दो  !

तुम्हारे चाहने वाले अगर सैंकड़ो है
तो बस इतना ही समजलो तो काफी है
की
हम उनमे से एक है  ;

मुज़े कबूल है मेरी गुस्ताखी ,
इसकी सज़ा शायद तुम न दे पाओगी  ;

और अपने आपको क्या सज़ा दु  ?
बहुत पहिले ही ख़ुदकुशी कर चूका हूँ  ;

फिर भी द्रोणाचार्य की तराह
तुम भी तुम्हारे अर्जुन के लिए
मेरा अंगूठा मांग शकती हो  --

ये जानते हुए भी की
इसकी जान
अब करीबन जा चुकी हैं  !


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20  July  1985

आँखों की पलकों पर

अब तक तो आँखों की पलकों पर
हमे उठाये हुए  हो , 
अगर आँखे बंद कर दोगी 
तो हम कहा जाके  गिरेंगे ?

हमने तो  खौसला  पहलेसे ही जला  रखा है 
अब चाहो  तो पंखे  भी जला   दो !

तुम्हारे चाहनेवाले अगर सैंकड़ो है ,
तो बस इतना ही समज  लो तो काफी है 
की हम उन में से एक  है .

मुझे कबूल है मेरी गुस्ताखी 
उसकी सजा शायद तुम न दे पाओगी .
और अपने आप को क्या सजा दूँ ?
बहुत पहले ही ख़ुदकुशी कर चूका हूँ .

फिर भी द्रोणाचार्य की तरह 
तुम भी तुम्हारे अर्जुन के लिए 
मेरा अंगूठा मांग सकती हो -

ये जानते हुए की
इसकी  जान अब करीबन जा चुकी है!

Thursday, 4 July 1985

रिश्ते

ऐसे भी कुछ रिश्ते हैं
जो बनाये नहीं जाते
अपने आप बन जाते हैं।

तेरे मेरे बीच भी कुछ ऐसा ही हुआ -
अब काहे की सफाई ?

अपनोसे भला कोई इन्साफ  मांगता हैं ?

मै तुम्हे गुन्हगारो की तरह
प्यार नहीं करूँगा
क्योंकी मैंने कोई गुन्हा नहीं किया -

फ़िर भी
ज़माने ने उम्र भर की सज़ा
दे ही रख्ही  हैं !

मगर ये जमाना क्या जाने ?

तुम्हारे गमों के भी काबील
अगर तुम हमे समझोगी
तो एक क्या,
हम बार बार की  उम्रकैद के लिए
खुदा  से दुआ  मांगेगे।


Wednesday, 3 July 1985

अब आगे क्या कहा जाए ?

अब आगे क्या कहा जाए ?
कहेने को तो बहुत  कुछ  हैं
मगर सुननेवाला भी  तो चाहिए !

सभी को प्यारी हैं
अरमानो के  मचलनेवाली बात -
मेरे पास तो हैं ,
गमों की अँधेरी रातों वाली बात-

काश ! उस बेरहम प्रिया को
इतना तो पता होता
की किस कदर हम उनके
हमसफ़र हैं -

जब  रात  के अँधेरे में
उनका साया भी,
 "सायोनारा " कहे बिना
लौट जाता हैं ,
तब भी हमारी वफायें
उनके  कदमों को चूमती
चली जा रही हैं !

उन्हें जो जी चाहे माने

हम तो खुद को
उनके  हमसफ़र मानकर,
रात के अँधेरे को  पीते जायेंगे।