Hi Friends,

Even as I launch this today ( my 80th Birthday ), I realize that there is yet so much to say and do.

There is just no time to look back, no time to wonder,"Will anyone read these pages?"

With regards,
Hemen Parekh
27 June 2013

Saturday, 28 September 1985

तेरे मेरे दरमियाँ

तेरे मेरे दरमियाँ
एक ज़िन्दगी और
दो  मौत का फांसला हैं

हर सुबहा  की एक शाम होती हें

तब ये सोच के मन को  सराहता हूँ की
चलो, फांसला कुछ तो कट गया !

फिर गमों के अन्धेरोवाली रात मै
कराहता हूँ की
अब तो बहुत फांसला रह गया !

परबत होता तो तूफां होके  टकरा जाता ,
मगर ये तो
दुनियाँ की रसमों का दरियाँ हैं
तेरे मेरे दरमियाँ ;

ये तय नहीं कर पायेंगे इस  जनम  में
मेरे कसमों की कश्ती को
तुम्हारे प्यार का पतवार हैं ?

मगर जब
हर शाम की सुबह होती हैं
तब लगता हैं फांसला उतना ही बाकी हैं
जितना एक ज़िन्दगी
और दो  मौत के बीच

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28  Sept  1985