Hi Friends,

Even as I launch this today ( my 80th Birthday ), I realize that there is yet so much to say and do.

There is just no time to look back, no time to wonder,"Will anyone read these pages?"

With regards,
Hemen Parekh
27 June 2013

Sunday, 5 January 1986

तो क्या शोले शबनम हो जायेंगे ?

जिस बालू की दिवार में बंधा हूँ
वो तो खुद मैंने ही बनाई है ,

और अब चाहता हूँ की
तुम उसे तोड़ दो  !

ये सवाल अबतक तुमने उठाया नहीं
मगर तुम्हे हक्क है के पूछो ,

"  दिन के उजाले में जब मैंने बिज बोया
   तब तो मेरा हाथ थाम कर रोक न शके  -

   अब चाहते हो की इस बगिया को
   मेरे ही हाथो से उखाड़ कर फेंक दू  ?  "

तुम्हारे सीने से फ़टकर ,
ज्वालामुखी
शायद शांत हो गया हो -

संसार के संबंधो से शायद
तुम्हारे प्यार ने हार मान ली  ;

-- मैं कभी हार नहीं मानूंगा ,

रेत की दीवाल से
एक एक कण उठाके ,
गमो के दरिये में
बहा दूंगा  ;

मेरे सीने में सुलगते शोले को
अगर तुम देख न पाओ ,

तो क्या
शोले शबनम हो जायेंगे  ?

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05  Jan  1986

मैं धुआं हु

कहानी में होते है
नायक , खलनायक और,
बहुत ही सुन्दर ,
गुडिया जैसी
एक नायिका  :

    तुम गुडिया जरुर हो ,
    मगर ये कहानी नहीं ,
    होनी है  ;

जिसकी कोई नायिका नहीं ,
ऐसी एक जिंदगानी है ;

और अभी तक
तय नहीं कर पाया
की ,
मैं नायक हु
या खलनायक  !

कभी कभी
ऐसा अहेसास होता है की
मैं धुआं हु  --

मेरे अस्तित्व में
जिसने जो चाहा ,
वो देख लिया  ;

    क्या किसीने ये भी सोचा की
    जिस आकार लेकर
    मैं उनके सामने आया ,
    वो मैं नहीं हूँ  ?

हरपल नया आकार पाकर
ऊपर उठता जा रहा हूँ ,

    जितनी देर तुम्हारे बांहों में बाँध शको
    उतनी देर तुम्हारा हूँ

-- बाकि हूँ अनहोनी  !

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05  Jan  1986