Hi Friends,

Even as I launch this today ( my 80th Birthday ), I realize that there is yet so much to say and do.

There is just no time to look back, no time to wonder,"Will anyone read these pages?"

With regards,
Hemen Parekh
27 June 2013

Friday, 22 May 1987

एक रात का आशरा ?


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मेरा घर
अगर हो ना शका
तेरा रैन बसेरा ,

तेरे घर में
क्या दे पाओगी मुज़े
एक रात का आशरा  ?

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22  May  1987

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मगर तुम्हे कैसी फुरसत ?


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तू सरिता
तेरे ही किनारे है
मेरा कूबा  ;

ज़रा गौर से देखो
तो
ये भी पता चल जायेगा की
कूबे में हैं
अँधेरा ही अँधेरा  ;

मगर तुम्हे कैसी फुरसत  ?

एक पल भी ठहर जाने को
मनाउ तो कैसे  ?

इस अँधेरे में तुम्हे
फूल चढ़ाऊ तो भी कैसे  ?

तुम्हे शायद परवा नहीं
की
मेरे आंसू ओ के ज़रने

तुम्हे जा मीले
या ना मीले

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22  May  1987

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Tuesday, 19 May 1987

तू है मेरा लास्यन्रुत्य


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मैं पहाड़ हूँ
तूं नदि ,

अगर मैं कुछ ज्यादा ही रो दू
तो उभर आती हो  !

राहबर को छोडके
कहाँ चली जाती हो  ?

तुम मेरी प्रिया हो
क्यूंकि
तुम मेरे सीने से निकली हो ,

इतना तो सोचो
के
जिसे प्रितम मान के
मिलने चली हो ,

वो समंदर तो
तुम्हारा अस्तित्व
तुम्हारा अपनापन ही
मिटा देंगा  !

मैं हिमाला का शंकर
तू है मेरा लास्यन्रुत्य
तू सरिता

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19  May  1987

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Monday, 18 May 1987

एक रात बीतने दो


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तुम भी तो डूबते सूरज हो ,

मेरी चट्टानों पर
सदियो से जमी हुई बरफ को
पिघला ना पाओगे  ;

एक रात बीतने दो ,

कल सुबहा
तुम्हारी किरने जवाँ होंगी ,

मेरी बरफ भी होंगी
मायुश

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18  May  1987

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Sunday, 17 May 1987

तब तुम आ जाना



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बहुत देर से निकला हूँ
तेरी गलियों में ,

कौन पहेचानेगा की
मैं भी तेरा दिवाना हूँ  ?

उठाके आँख अब,
मत देखो ज़रोखो से ,

मैंने उठाई है जो कंधो पर
उस इश्क की मैयत को
क्या देख पाओगी  ?

अब तो
आरज़ू ओ के
आसमां भी पिघल गए ,

गमो के दरिये भी
बह गए  ;

ज़ेलम के किनारे
चिनार के
एक एक कर
पत्ते जब गिरने लगे
तब तुम आ जाना



17-05-1987


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