Hi Friends,

Even as I launch this today ( my 80th Birthday ), I realize that there is yet so much to say and do.

There is just no time to look back, no time to wonder,"Will anyone read these pages?"

With regards,
Hemen Parekh
27 June 2013

Sunday, 29 May 1988

हमसफ़र न ही सही

बस ,
आँखे बांध करते ही
तुम सामने आ गई  --

मुज़े क्या मालुम
मेरी आंखोमे
झांखते झांखते ,

कब आकर
तुम
अन्दर ही अन्दर समा गई ;

तुमने दूर रह कर
सताया बहुत ,

पास आकर कभी
सराहा भी होता !

तुम्हे जो मंज़ूर
हमें कबूल हैं  --

'गर गमेरन्जोका
हमें दरिया मिला ,

तो तुमने भी
अफसानोके
पिघलते
आसमां को ज़ेला है --

हमसफ़र न ही सही
हमनसिब तो हो !

ना मेरे पीछे थी
कोई कहानी  --

ना है तुम्हारे सामने
आनेवाली कोई होनी  !

शायद येही
गनीमत है की
ज़मानेने
हमें ना पहेचाना .


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Madrid  /   29   May   1988

Saturday, 28 May 1988

क्या तुमने कुछ कहेना चाहा ?

साँसे रही ,
बाते न रही  --

ना धड़कन
ना तरपन
सिर्फ एक सननाटा ,

क्या तुमने कुछ कहेना चाहा  ?

मै तो
मेरी ही सुनाये जा रहा हूँ ,

कहानी तो तुमारी भी है  !

पूछने लायक अब ,
कोई सवाल बाकी नहीं

देने के लिए अब
कोई जवाब नहीं ,

सिर्फ सननाटा --

मै ने दीवाल होकर
समन्दरको रोकना ठाना  !

तुम्हारा जलवा देख कर
मैंने ,
आकाश को कंधे पर उठाना
चाहा  !

दिवाले टूट कर
चूर चूर कर ,
रेत हो गई ,

और

समय के समंदर ने
कुछ बहाना भी न छोड़ा ,

अब तो आकाश के बादलो
मुज़े
उठाये हुवे है ,

कब
कहाँ जाके
गिरा देंगे !

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Garden Tuilleries  /  Paris

28  May  1988

Friday, 13 May 1988

तुम राधा हो मैं कृष्ण

अफ़सोस ये नहीं के
जिन्दगी में बाकी रहे अब
विराने ही विराने ;

अफ़सोस ये है की
कभी खत्म हो जायेंगे
गमो के अफ़साने  !

शराब बदल गई ,
क्या साकी भी बदल जाएँगी ?

ये भी होना था
की
ख्वाब के रंग बिरंग
एक एक कर
तितलियों की तरह
उड़ जायेंगे ---

बसंत की यादे भी
धुप में पिघल कर
धुंए की तरह
हवा में बिखर जाएँगी ;

हम तुम्हारी वफ़ाओ के
काबिल नहीं

अब भी समज़ जाओ ,
हो शके तो अब भी मूड जाओ
मुज़े अकेला छोड़ जाओ  ;

जीवन की राहोमे
तुमने सरगम चाही --

तुम राधा हो
मैं कृष्ण

कभी तुम्हारा ना हो शकने वाला
जीवनभर का तृष्ण  --

तुमने तो सपना समज कर
जीवन से समजौता कर लिया ,
मैं सपनोको सच बनाने
जिंदगानी से ज़गड़ता रहा ;

उडु तो कैसे उडु  ?
तुम मुज़े पंख दे ना पाओगी  !

अब तो मेरी राहमे
गिधड़े
राह तकते है ,

उन्हें मुर्दों से प्यार हैं
और मेरी जिस्म से
रूह तो
बहुत दिन हुए
निकल चुकी हैं !

गिला करू तो किन किन का ?

तुम्हारे बदन को छू कर
तड़पने के भी काबिल
नहीं रहा  !

तुम्हे ,
कभी जो
आसमान को छू ने ले  चला था ,
उसकी आज
आसमा तक आँखे भी
ऊठती नहीं  !

मैं तो अभी सोने चला ,
शायद
तुम वहाँ ही मिल जाओ !


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London - Washington Flight  /  !3  May  1988