Hi Friends,

Even as I launch this today ( my 80th Birthday ), I realize that there is yet so much to say and do.

There is just no time to look back, no time to wonder,"Will anyone read these pages?"

With regards,
Hemen Parekh
27 June 2013

Friday, 19 July 2013

आँखे बंद कर

हवा मदभरी हैं
गगन में खिले
कई तारे भी हैं ;

वृक्ष घटा में
चांदनी तड़पती हैं

आँखे बंद कर
नदी के किनारे
मैं सोया हुआ हूँ

कैसे ख्वाब में खोया हुआ हूँ ?

Thursday, 4 July 2013

चांदनी

चांदनी


दिखा के इक ज़लक
अब कहाँ तू छीप गई ,

राह तकते
देख मेरी
ये अंधेरी
रात कैसी है भई सुनी .


क्या जानती
अय प्रिया ,
अरमान क्या क्या तडपती
अन्गारसे जो उठ रही
व्हों धुआं क्या मचलती

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Written /  05,May 1959

आ गये हो तुम

आ गये हो तुम
बसंत लेके,
बिराने में
बहारसे छा गये हो तुम ;

प्रिया मुस्कानसे
हृदयके भाव कैसे
उलज़ा गए हो तुम ;

हमारे ओष्ट को
अपने अधरसे ,
सुधा कौन
ये पिला गए हो तुंम ;

क्या पा चुके हो
दिल लेकर,
ये दर्द देकर
क्या दे गए हो तुम ?

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Written  /  05 May 1959


आज बरखा हो रही हैं

आज बरखा हो रही हैं
और
आभमे छाये हुए
काले बादलों की गर्जन
सुनकर
मेरा दिल तड़पता है
कोई सखी के बिरह में ;

जिस नादाँ
अभी तो
हमसे है अनजान
और हमारी
नहीं हैं
उससे कोई पहेचान ;

किन्तु
चाहता हूँ
लेकर मेरा जब ,
प्रेमका तोहफा
अषाढ़ के बादल
हिमालय की चोटी से
टकरा जाते हैं

और जब गाती है
रिमजिम सुर में ,
बरखा की बूंदे ;
तब अरमाने
हो भी मचलती ,
प्रेम भरे
को नाजुक दिलकी
वो बिरहन की
जिस से नहीं हुई हैं
अभी हमे पहेचान

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Written / 28, May 1957



अमास के अँधेरे

खिले पूर्ण चन्द्र जब
तब छलके ,
जल चंचल
उदधिके ;

किन्तु तरंगे
गहरे जल की
मन जलधि की
शोर मचाये ;

जब छा जाये
मन के गगन में
आमासरात  के
गहन अँधेरे .

और उठती
प्रेम की
प्रचंड पिपासा ,
बन के व्याकुल
प्राण छेड़ते
सुर बिरह के ;

बुज़ भी जाते
रह रह के ,
दिये हर एक
रंग महल के
जब छा जाते
अमास के अँधेरे

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Written  /  03 , Mar  1957

बदल देंगे हम

बदल देंगे हम
सूरत सारी जहाँकि
और बनायेंगे नयी
शकल हिन्दोस्ताकी ;

तोडके पहाड़ की चटान
नापेंगे सड़क
कश्मीर से लेकर
कन्याकुमारी ,
द्वारका से नाग्भूमि ;

और बांधे बन्ध हम
ब्रह्मपुत्र से सतलज -
कृष्णा और कावेरी के
रोक देंगे हम जल,

बिजली बनादे
रौशनी छा दे ;

मजदूर को मालिक बनादे
किसान की हम भूख मिटादे  -

मरुभूमि इस भारत की में
हम हरा एक बाग़  लगा दे

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Written  /  24 Jan  1958