Hi Friends,

Even as I launch this today ( my 80th Birthday ), I realize that there is yet so much to say and do.

There is just no time to look back, no time to wonder,"Will anyone read these pages?"

With regards,
Hemen Parekh
27 June 2013

Friday, 23 August 2013

अब की आखिर बार

पथ्हर के देवता के पास
जाकर बोली ,
गरीब घर की नारी ,

     " अंतर्यामी ,
       जानती हूँ
      कर्म की गति न्यारी ,
      किन्तु ,
      हुआ क्या हमसे अपराध ,
      के
      गरीब घर में हुए
     लक्ष्मी के सात अवतार  !

     हे दीनानाथ ,
     दिन घराने में,
     अब की आखिर बार  "

मेरे ख्वाब में

मिलतो हो तुम आधी रात में
चोरी चोरी , मेरे ख्वाब में ;
नैन भरी ये नींद हमारी
शोक भरी है रैन तुम्हारी

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07 Nov 1959

बहाने भी बन जाते है

ऐसा क्यों होता है ,
जब सुपनो की सृष्टि में
मै  खो जाता हु ,

तब मुलाक़ात हो ही जाती है
हमेशा
एक परिचित व्यक्ति से ही ,
जिसे कोई नहीं अधिकार
ऐसे छिप छिप के मिलने का ,
जो हमे है नामंजूर ,
जब हम चाहते है
उन्हें भूलना ,
एक कृत्रिम नफ़रत से  ;

और भला , ऐसा क्यों ,
दिनभर खुद ही तड़पते है
हम ,
वो बेरहम को मिलने ,
और तमन्नाओ भी
मचलती है बुरी तरह से ,

बहाने भी बन जाते है ,
हंसने हसाने के ,

फिर भी रहते है क्यों
आप आँख चुराए  ?

फिर देर कैसी हो रही ?

हवा है गगन में ,
रात की प्यारी सखी
चांदनी है  ;

मेरे लबो पर प्यास है
एरी सखी  ;
आँख में तेरे ख्वाब है ;

फिर देर कैसी हो रही  ?

अय बांसुरी ,
बजने से क्यों खामोश है  ?

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Mumbai
22 Dec 1958

Thursday, 22 August 2013

फिर तरन्नुम कैसे उठे ?

आप के प्यार के ,
आप की वफ़ाओ के ,
काबिल ना सही  ;

आप के गम के ,
आप की जफ़ाओ के ,
काबिल भी नहीं  ?

मेरे नगमो की तरह
तुम्हारे प्यार को
जिस्म नहीं  !

मिला ना ,
मिलन का साज ,

मेरे नगमो को ,
तुम्हारे प्यार को ,

फिर तरन्नुम कैसे उठे  ?

अगर गम के सहारे जी ना शके तो
क्यू जिए ?

मिटने के ,
अब कितने बहाने चाहिए ?

खोया हुआ हूँ

हवा मदभरी है
गगन में खिले
कई तारे भी है  ;

वृक्ष घटा में ,
चांदनी भी तड़पती है ,

आँखे बंध कर
नदी के किनारे
मै सोया हुआ हूँ ,
कैसे ख्वाब में
खोया हुआ हूँ  

Saturday, 17 August 2013

मेरी चांदनी

मैं चाँद बनूँगा मधुबन में
खिले तारो के बिच ,

रात सुहानी में है हँसती
मेरी चांदनी
बनती - बिगडती  ,

देख तुम्हारी मस्त जवानी
मैं जल जाऊ नील गगन में ,

और छिप जाऊं
काले बादल के बिच

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Detroit   /   23 Aug 1956









मेरा क्या गुनाह

मुज़से रूठे हो विधाता ,
पर मैं तुम्हे कैसे मनाउ ,

जब येही ना जानता
की मेरा क्या गुनाह  !


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Original  Hindi  /  10 Apr 1959

Gujarati Translation  /  16  July  2016

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બદલો તેં લીધો શાનો  ?

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મારો શું ગુન્હો , વિધાતા  ?
જાણું તો તને મનાવું


ન જાણું
તો કેમ સમઝાઉં  ?


કર્યો નાં કોઈ
ગુન્હો મેં , વિધાતા  !


બદલો તેં લીધો શાનો  ?


બોલવા ટાણે
મૌન રહેવાનો  ?

લાગી ફરજ જે
યાદ કરવાનો  ?


ચડાવ્યા જે કરજ તે
ચુકાવવા નો  ?


હવે શું રહ્યું બાકી  ?
માંગુ હવે
શેની માફી  ?















Friday, 16 August 2013

रहम कर

कभी तुम्हारी याद आ जाती है
ह्रदय में आग जल जाती है ,

कितनी बेबशी से तडपते है अरमान
कलम भी हमारी कहेती है ,

" रहम कर अब
  अय जुलमगर  ! "

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10 Mar 1957

Monday, 12 August 2013

ये दिल की तडपन

जो मनमे है
वो
ओठो पे क्यूँ आ न शके  ?

ये दिल की तडपन
दिल में भी तो समा न शके

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12  Aug  2013