Hi Friends,

Even as I launch this today ( my 80th Birthday ), I realize that there is yet so much to say and do.

There is just no time to look back, no time to wonder,"Will anyone read these pages?"

With regards,
Hemen Parekh
27 June 2013

Friday, 29 August 2014

" कहाँ हैं मेरी जलपरी ? "

मन ही मनमें 
बनाया एक महल ,

सोचा भी नहीं कि 
जिंदे जी 
मेरी ही मज़ार बन जायेगा  !

सुहाने सपनो को पिरो के 
खुद ही बनायीं 
एक ज़ंज़ीर ,

सोचा भी नहीं की 
मेरे ही पैरो में बंध जायेगी  !

अफसानों की जाल लेकर 
माज़ी चला मज़धार 

पकड़ न पाया मत्स्य गन्धा 

जाल में उलज़ा रहा 
खुद नाखुदा ,

और खुदा  को पूछता रहा बन्दा ,

" कहाँ हैं मेरी जलपरी ? "

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Translated from original Gujarati poem of 16 June 1957