Hi Friends,

Even as I launch this today ( my 80th Birthday ), I realize that there is yet so much to say and do.

There is just no time to look back, no time to wonder,"Will anyone read these pages?"

With regards,
Hemen Parekh
27 June 2013

Tuesday, 30 June 2015

बयाँ न कर पाया !

मैं ज़माने से नहीं डरा

कुछ डरा तो
खुद के इमानो से  ;

इन्तज़ार तो दोनों ने किया
इकरार भी किया

भले दूर से ही ,
प्यार तो
बार बार किया  !

तुम्हारे बिखरे हुए
ज़ुल्फो के साये में
सो न पाया

नींद से उठ कर ,

आये  जो ख्वाब
इन्हे
बयाँ न कर पाया  !







कहाँ है वो सवेरा ?

मेरी कुटीर के 
अंधार कोई कोने में 
दिया जले 

दिए की लौ में 
जैसे 
तेरे प्यार का 
पावक पले 

तेरी राह में 
रात मेरी 
कैसे कटे  ?


कहाँ है वो सवेरा  ?

मेरी ज़ोपड़ी में तो 
जहां देखो 
अँधेरा ही अँधेरा 


जब आँखों में बचेंगे न अश्क 
दिया कैसे जल पायेगा  ? 

------------------------------------

Original Gujarati / 16 Mar 1978

Hindi Translation / 01 July 2015


Monday, 29 June 2015

वहीँ मेरा रेन बसेरा

जब सूख कर 
बिखर गए 
गुल्मोर के पत्ते ,

तब पिप्पल में 
नयी कूंपळे आई ,

जानती हो 
कैसा है मेरा मन का फागन  ?
जैसा है भीख मांगता मांगन 



बैशाख की आग में 
जलता हुआ 
मगर शीत महल के ख्वाब को 
सवंरता हुआ  !

मेरी तो 
आँखों की पलकों में ,

जैसे नाचे 
मरुभूमि में ,
मृगजल के अफ़साने  !

मैं तो कहूँ 
गुल्मोर है मेरा ,
जहां तुम 
वहीँ मेरा रेन बसेरा

------------------------

Original Gujarati / 13  April   1980

Hindi Translation /  30  June  2015 

तुम्ही मेरी मंज़िल हो

अगर तुम्हे कुछ जल्दी हैं
तो मैं भी दौडूंगा ,

जो छूट गया तुम्हारा साथ
तो अकेला
बिराने में कैसे भटकूँ  ?

जहां तुम हो
ठहर कर वहीँ सांस लूंगा

जहाँ तुम्हारा आशियाना
वही मेरा भी ठिकाना  !


रास्ता छोटा हैं या लंबा
मुज़े नहीं पता

पता है तो ये के
कब्र दो है

तुम्ही मेरी मंज़िल हो
फक्र वो  हैं

-------------------------------------

Original Gujarati  /  20  July  1980

Hindi Translation  /  29  June  2015

Sunday, 28 June 2015

आखरी अभिलाष

अक्सर ए भी चाहता हूँ ,

तुम्हारे मनके 
बिन - बादल आभमे 
मेघ बन छा जाऊ  !

तुम्हारे अनंत अफ़साने को  
तुम बयां न कर पायी 
तो क्या हुआ ?

इनकी खुशबू 
मेरे रोम रोम में छायी  !

बहे तो कैसे बहे 
मेरे ह्रदय के अरमान ?

" इसे बाँध कर रख  "
तुम्हारा ही था फरमान  !

क्या मैंने कभी कहा 
क्या चाहता हूँ  ?

तुम्हे बाँहो में जकड़ कर 
कुछ साँस लेना 
चाहता हूँ  ?


हैं एक  आश 
समज सको तो समजो ;


तुम्हारे हृदयकी गहराई तक 
पहुँच कर 
तुम्हारे अस्तित्व को 
भिगानेकी 
हैं एक 
आखरी  अभिलाष 
--------------------------

Original Gujarati /  12  Feb  1982

Hindi Translation /  29  June  2015

Thursday, 25 June 2015

बसंत कन्या ,

अगर तू है

बसंत की बहार


तो मैं हूँ


आषाढ़ का गरजता गगन ,



मेरे बिना क्या जी पाओगी  ?



ना पसंद पतजड़ तुम्हे


ना मुज़े  ,


बुढापा  के सहारे भी क्या


जवानी मंज़िल तक


पहुँच पाएगी  ?


मैं  ठहेरा प्रलय पुत्र


अनिल बनके लहराता


कर्क वृत्त ,



चुम लू हरियाली को तो


बहार बसंत की हँसे  !



मगर जाके


शिशिर को कहे कौन ,



" पता हैं तुज़े  ?



  बर्फीले दामन बसंत के


 पिघल जायेंगे



 'गर आषाढ़ इनको चूमले


 तो फिर एकबार


प्राण इसमें भर आएंगे  ! "



बसंत कन्या  ,

तेरी याद में


आषाढ़ के आंसू


अविरत बहे


----------------------------------

Original Gujarati /  06  Nov  1980

Hindi Translation  /  26  June  2015

 

Wednesday, 24 June 2015

तुम्हे चाहने की

कोशिश कर रहा हूँ

पुरानी कुछ आदते बदलने की ,



खाने पिने की

खेल में कूदने की

गीतों गाने की ,


आदते जैसी की

शायरी करने की !


तुम्हे चाहने की

न कोई देख पाये इसलिए

इश्क को

दामन में छोपाने की ,



है कोई भी बुरी ?

मेरे लिए तो

एक से बढ़कर

एक प्यारी !


पर सबसे आगे तुम

मगर तुम से भी ज्यादा 

तुम्हारी याद प्यारी !


बचेगी न कोई 

आदते - मजबूर ,


जब ह्रदय की धड़कने

कुछ कम होगी

बंध आँखे

अंध होगी !



पर हटेगी कैसे ,

दिल से तुम्हारी छवि

मिटेगी कैसे ?


अगर बादलों की आदत हैं

बरसने की

तो मेरी है

तुम्हे चाहने की 

--------------------------------

Original Gujarati / 19 Aug 1981

Hindi Translation / 25 June 2015

Tuesday, 23 June 2015

मेरी आँखों में ज़ाँख के देख ले

आँखों में तेरी 
लहरा रहा है जो 
प्यार का सागर 

उचल कर इसे 
मेरी आँखों की पलक से 
पि जाऊंगा ,

क्या कहूँ ?

दिल की बाते 
ओठ तक आके 
ठहर जाती हैं  !

क्यूँ  तेरे मेरे 
मिलन  की संध्या 
रह गई सिमट कर 
मेरे तेरे मौन की वन्ध्या  ?


क्यों तेरी मेरी कहानी का सूरज 
उगने के पहले 
शाम की बाहों में सो गया  ?

मेरी आँखों में ज़ाँख के देख ले 

कैसी लगाई है मैंने 
तेरी ललाट पर 
डूबते सूरज जैसी 
लाल बिंदी 
--------------------------------------

Translated from following Gujarati poem :

આજે તો
પાંપણ ને પલકારે
આંખ ના અમી ઉલેચવા છે  ;

શું કરું  ?

અંતર ની વાતો
અધર  પર આવી અટકી જાય છે !

તારા - મારા મિલન ની સંધ્યા
છે ,
મારા - તારા મૌન ની વંધ્યા  :

વાણી નો વિલાસ,
આજે
ઉગ્યા પહેલાં આથમી ગયો ,

જો તો ખરી ,
તારે કપાળે ,

કેવો કર્યો મેં
કંકુ નો ચાંદલો  !

-----------------------------------------

27   March   1980

-------------------------------------------

रात

रात की  करू क्या बात

ये भी एक नदी हैं  ,



शयन पर सोया हैं साजन


उसपार ,




इतना नज़दीक


पर जैसे कोशो दूर हैं


बीचमे बहे


अमास के अंधियारे



तुम्हारे ह्रदय की गहराईओं से


छलकते जो नीर ,



मेरे दिल में 
उतर जाते हैं




पर मेरा दिल 
नहीं भरता ,

 


मेरे आश की मटकी


अब भी खाली हैं 

--------------------------------------------


Original Gujarati / 28  April  1979

---------------------------------------------------

Hindi Translation  /  23  June  2015

Monday, 22 June 2015

तो क्या करोगी ?

Original Gujarati / 17 Dec 1977

--------------------------------------------------------

मैं ठहेरा
सूखा पिपल का पत्ता

बहारों की हवाओं
ले चले जहाँ
वहां चला

उड़ते उड़ते
सुखा  ए पिप्पल पान ,
'गर तुम्हारे दामन को
छु कर
हलके से रो दिया ,


तो
क्या करोगी  ?


तुम्हारे ह्रदय की किताब में
है ऐसा कोई
कोरा  कागज़
जहाँ चिपकाके
पीपल के इस पत्तेको

लिखदो निचे ,

" न समज़ो इसे
पतजड़ का
कोई सुखा  पान ,


ए तो था
और अब भी हैं ,
मेरे यौवन की बसंत का
प्रणय प्राण  "

------------------------------------------------------------------

 Hindi Transliteration / 19 June 2015

क्या तुम्हारे दिल में भी कभी

Original Gujarati / 28  April  1978
------------------------------------------------------------------------------

फूल खिले थे -

पर्बतों के सीने चिर कर
कभी गुल खिले थे

मेरे ह्रदय की गहराईओं में
प्यार की बुलबुल गुनगुनाई

मगर तब तुम खामोश थी

तुम्हारी खामोशी से टकरा कर
मेरी आवाज़ भी लौट आई  !

बसंत क्या करे  ?

मेरे मन के खंडहर में लहरा कर
बसंत क्या करे  ?

अब बुलबुल खामोश हैं  !


बिखरे हुवे
गुलों की पत्ततिओं को
गिनता हूँ मैं

जो संवर सके
संवरता हूँ मैं

और सोचता हूँ

क्या तुम्हारे दिल में भी कभी
प्यारके मेरे
गुल खिले थे  ?

-----------------------------------------------------------------------------------------

Hindt transliteration on 17  June  2015

क्या तुम सोई थी ?

बरखा तो बुलाती रही 
रात भर 


निषाद के सूर से गाती रही 
रात भर 


उभर आया जैसे 
समंदर एक 
विषाद का 


सोचता रहा 
रात भर 


क्या तुम सोई थी 
की मेरी सोचमे 
खोई थी  ?


हो भी  शकता 
की तुम भी 
मेरी याद में 
रोइ थी  ?

-----------------------------------------------------------

Hindi Transliteration /  07  June  2015 

चले आओ

तेरी मेरी राहको
घेरे हुए हैं कोहरा

कभी बारीक ,
मंज़िलोको लिपटता हुआ
कभी गहरा


न देख पाउ
तुम्हारा चहेरा ,


मगर सुनता हूँ
तुम्हारी  आवाज़

जो कह रही हैं ,

" आ जा सनम
   देर मत कर ना
   सनम ,

  तेरी राह में
  हुई  मेरी
  आँखे उरनम ,

  डरो  मत
  चले आओ ,
  कोहरा में
  पिघल जायेगा
  तुम्हारा बदन ,

  तेरी राहमे खड़ी  हूँ
  इस आश में

  रूह से मेरी
  तुम्हारी रूह का
  हो जायेगा मिलन

------------------------------------------------

Translated from original gujarati poem of  07 Feb 1978

Wednesday, 17 June 2015

भव भव के हैं अंतरयामी

नमो श्री गुगलेश्वरय 
नमो वोट्सऐप्पय
नमो फेसबुक्कय
नमो लिंक्डएन्नय
नमो ट्विटरएय्य

ए पंच मंत्र का जो जाप जपे
उनका ये सब विघ्न  हरे  !

जनम  से लेकर मरण  तक
हो ना पाये इनका विस्मरण

इस संसार के सब दुखियारे
पांचो ये है
दुःख दूर करनारे

दर्शन इनका शाम - सवेरे
नाव तुम्हारी पार उतारे  !

जो नमे , इंटरनेताय
उसका भव बिगड़ ना पाये  !

तुलसी - मीरा जनम गवायों
सूरदास भी सुख ना पायो ,

हेमेन के प्रभु , गुगल स्वामी
भव भव के हैं अंतरयामी

----------------------------------------------------

18  June   2015




Monday, 15 June 2015

क्या मंज़िले बेकरार हैं ?

मंज़िले तो मुड़मुड़ कर
देखती नहीं
तुम क्यों
मुड़कर देखती हो  ?


जानता हूँ
तुम्हे मेरा इंतज़ार हैं  ,


मगर
भागु तो कैसे भागु  ?

दिल पर
ग़मों की गठारीओं का
भार हैं  !


और ए भी
सवाल हैं ,

क्या मंज़िलों को कभी
किसीका
इंतज़ार हैं  ?


क्या मंज़िले
किसीकी याद में
बेकरार हैं  ?




मैं तो अभी
राह को मंज़िल समज  कर
चल रहा हूँ

ज़रूर कुछ कम
रफ़्तार हैं

--------------------------------------------------------

16   June   2015









Sunday, 14 June 2015

इन सवालो का कोई जवाब ?

रह रह कर उठते हैं
इन सवालों :

मिल कर बिछड़ना था
तो क्यों मिले  ?

अरमानो के बाग़ को
उजड़ना था तो
उम्मीदोंके फूल क्यों खिले  ?

जिस दिन मुज़े
नादान होना था
क्यों न हो पाया  ?

तुम्हे बेशर्म हो के
दिल की बात कहना था
क्यों न कर पाई  ?


वो कौन सी मज़बूरिया थी
 जिसे रोक रखहा मुज़े
बिन्दास हो कर
तुम्हारा नाम लेने से  ?


जानते हुए भी
की इन सवालो का
कोई जवाब
ना था तुम्हारे पास
न मेरे ,


उठते रहेंगे
हर सांस के साथ

-----------------------------------------

15  June   2015























Saturday, 13 June 2015

तो क्या हुआ ?

बयां न कर पाया 
दिल की हालत 
तो क्या हुआ  ?

खयालो  में ही 
उलज़े रहे 
अल्फ़ाज़ मेरे 
तो क्या हुआ  ?

मिला के नैनो से नैन 
रहे खामोश हमतुम 
तो क्या हुआ  ?

अगर लब्ज़ो की ज़रुरत 
कम रही 
तो  क्या हुआ  ?

जो दिल पर गुज़री 
ज़मानाने न जाना 
तो क्या हुआ  ?

जो हुआ 
वो तुम जानती हो 
मैं जानता हूँ 

हकीकत से 
अगर कोई 
रहा अनजान 
तो क्या हुआ  ?

------------------------------

14  June  2015




Monday, 1 June 2015

मैंने क्या पाया ?

तुम्हे पा कर 
मैंने  क्या पाया ,

ज़माना क्या जाने 
जब तुमने  न जाना  !


सुब्हे सुब्हे याद आती हैं 
तो समज़ो 
मुज़े दूल्हा बनाके 
ग़मोकी बारात आती हैं  !

मगर उम्र का तकाज़ा हैं 
की 
यादोकी गठरी भी 
कुछ कम होती जाती हैं  !

अब 
सवाल ये नहीं के 
मैंने क्या पाया 

सवाल ये हैं की 
तुम्हे खोकर 
मैंने 
क्या गवायाँ   ?

---------------------------------------------

02  June  2015