Hi Friends,

Even as I launch this today ( my 80th Birthday ), I realize that there is yet so much to say and do.

There is just no time to look back, no time to wonder,"Will anyone read these pages?"

With regards,
Hemen Parekh
27 June 2013

Wednesday, 29 July 2015

तुज़े क्या दु ?

तुज़े क्या दु ?

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जिसे कहे शकु मेरा 
कुछ न बचा ,

तुज़े क्या दु ?

तू देवता ,
तेरे मंदिर के आँगन में
बैठा मैं भिखारी ,

तुज़े क्या दु ?

ज़माना ने किया
जिससे किनारा

मैं हूँ वो कुष्ट रोगी !

मेरे नंगेपन की शर्म को
छुपाऊँ तो कैसे ?

तू ठहरा
पत्थर का देवता 
,
तुज़े क्या दु ?

ज़िंदा होना है ?

तो मांगलो ,
बचा जो मेरा
प्राण दु

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Original Gujarati / 16 Nov 1978

Hindi Translation / 30 July 2015
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આપું તને શું ?

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મારું કહી શકું
નથી રહ્યું તેવું -
તને શું આપું ?

બિછાનું પાથરી
બેઠો ભિખારી
મંદિર પ્રાંગણે ,
દેવ ને અર્ઘ્ય
શું આપે ?

હું કોઢીઓ
જગતભર નો ઢેઢીઓ ,

છુપાવવા મુખ મથું
મારી શરમ ને ચિંથરે ;

આપું તને શું ?

તું દેવ ,

પથ્થરતણી પ્રતિમા
તારે કદી જો જીવંત થાવું ,
માગજે
મારા પ્રાણ આપું .

Saturday, 18 July 2015

तेरी चुनरी की किनार है काली ,

तेरी ओढनी है काली 

पर
पालव रंग गुलाल ,

हर दोरे में सींचा मैंने
रंग लहू का लाल ,

ये कैसे मुमकिन ?

मेरी जो है कर्क राशि
और मेरा लहू है काला !

हो शकता है आंसू ओ से सींचा
मेरे आंसू ओ का रंग लाल !

इन आंसू ओ से उठती है
एक आग बिरह की,

जल जाता हूँ तो
रहे जाती हैं
ख़ाक बिरह की ,

ललाट से जो उठती है
वो अग्नि शिखाए
भस्म करेगी
अनंग को ,


तुम्हारी मांग में
भर ना पाया
सिन्दूर
ये सोच के ,

मीरा का जो कहान
वही तेरा सुहाग ,

तेरी मांग में
सिन्दूर नहीं 

मोहन के प्रेम की
श्याम के काम की
ख़ाक भर दू ,


तेरी चुनरी की किनार है काली ,

पर तेरे कहान की कांबली का
तू सफ़ेद धागा

मेरे काले रंग से
तू गोरी !
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Hindi Translation / 18 July 2015
Original Gujarati  /  Tuesday, 2 October 1979

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તારી ચુંદડી ની છે કિનાર કાળી
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તારી ઓઢણી ની કાળી કિનાર
મારાજ લોહી થી રંગેલ છે :

મારી કર્ક રાશિ
તેથી જ મારું લોહી કાળું છે !

પણ મારા આંસૂ ઓ નો રંગ
લાલ છે ,

એમાં જે વિપ્લવ ની આગ
ભડકે બળે છે ,
મને જ બાળે છે ;

મારા લલાટે ઉઠતી અગ્નિશિખા થી
આજે ,
મારો જ કામદેવ
રાખ થાશે ;


સિંદૂર તો આપી શક્યો ના ,


પણ તારો તો સુહાગ છે
મીરાં નો ,

તારે સેંથે તો
મોહન ના પ્રેમ ની
શ્યામ ના કામ ની
ભસ્મ જ શોભે ;


તારી ચુંદડી ની છે કિનાર કાળી :

પણ તારા કહાન ની કાંબળી નો
તું સફેદ દોરો ,

મારા શ્યામ રંગ થકી
તું ગોરો , ગોરો .

तू शमा , पतंग मैं

तू बसंत

हेमंत मैं  ,

होके तेरा


क्यों पराया  ?




तू शमा


पतंग मैं




जला ऐसा


की बना


अनल का रंग मैं ,




तू रति ,

अगर छु ले अनंग 

,
तेरे ह्रदय का मृदंग ,




उठे जो आवाज़


लेकर तेरे प्राण को


गूंजे


गगन का गुंबज


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Original  Gujarati  /  26  Nov  1978

Hindi Translation  /  19  July   2015


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તું શમા , પતંગ હું ,

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તું વસંત
હેમંત હું ,
તારો
છતાં પરાયો  ;

     તું શમા , પતંગ હું ,
     જળું એવો
     કે અનલનો
     બનું રંગ હું :

તું રતિ ,
તારા હૃદય ના મૃદંગ ને
અડે જો અનંગ ,

બની હું ધ્વની
ઉઠું ,

ભરું પ્રાણ થી તારા
અનંત અવનિ .

Thursday, 16 July 2015

क्या तू समज़ा ?





तू ने कर दी कमाल 


तकदीर  ,

कुछ कम दाम में ही 


मुज़े मोल लिया  !




पहनने को तो 


दी एक फटी सी खमीज़ 


और नौटंकी में बनाया राजा  !




ये कैसी तेरी तमीज़  !


तख़्त पर बिठाने से पहले 


कान में इतना तो कहना था ,




" ये नौटंकी है भव - भव की 

,
   यहां सच के नाम , कुछ भी नहीं  !



   सुब्हा होते जो देखतो हो

 ,
   बस समजो , आज का वो

 
   खेल है  ! "





तू जो ठहरा धूर्त 


मुज़े बनाया मुर्ख  !




क्या तू समज़ा  ?



शीशे में तूने

 
मुज़े उतारा  ?





तो फिर ए भी समज ले ,




दिया जो तूने 


झरूर वो

 
पाठ किया मैंने ,





पहनाया जो तूने

 
बेश भी पहना मैंने ,





डोरी खेंची तूने

 
वो ही

 
नाच किया मैंने ,





मगर 


ज़माने ने सूना जो


 
शबद तो  खुद का बोला  !


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Original Gujarati / 15 Oct 1979

Hindi Translation / 17 July 2015

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આજે તારો ભરમ ભાંગુ

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કરી કમાલ છે
તકદિર ,

તેં મને સસ્તા માં
સાટવી લીધો છે  !

ઉઘાડી એબ ને ઢાંકવા
કપડું નથી
પણ
રાજા નો પાઠ દીધો છે  !

તખ્તા પર ધકેલતા પહેલા
કાન માં તો કહેવું હતું  -

" ભવાઈ છે ભવાટવી ની ,
  જેવા દેશ તેવા વેશ છે ,

  સાચું કંઇ નથી -
  નાટક ના નિત નવા
  ખેલ છે ! "

કહ્યું તેં નહિ
તું ધૂતારો  ! !

તને એમ કે
તેં મને
શીશા માં ઉતાર્યો  !

પણ
આજે તારો ભરમ ભાંગુ  ;

ઉપર થી દોરી તેં ખેંચી
તે ખરું ,

વેશ તારા , પાઠ તારા ,
તે પણ ખરું ,

પણ

જયારે જયારે ખેલ ખેલ્યો ,
મારા ખુદ ના જ
શબદ બોલ્યો  !

तुम्हारी तलाश में

तुम्हारी तलाश में

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छा गए है आज 

रास्ते मधुबन के 

पीले पलाश से ,


बैठा हूँ मैं 

पुकुर के पास में 

तुम्हारी तलाश में ,


नुपुर के 

झंकार की आश में ,



कहाँ हो तुम ?


जिस दिशा में 

फेरता हूँ नज़र ,

तुम ही तुम हो !



फिर सोचता हूँ

जिसे ढूंढता हूँ 

वो तो छुपी है 

दिल की गहराईओं में ,

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Original Gujarati / 4 Oct 1979

Hindi Translation / 17 July 2015

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રાહ જોઉં છું .

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પલાશ ના ફૂલ થી આજે

મધુવન ને રસ્તે

પીળી ચાદર પાથરી છે :


પુકુર ની પાળીએ બેસી

તારા

નૂપુર ના ઝણકાર ની

રાહ જોઉં છું .

Wednesday, 15 July 2015

तुम्हारा कहान कैसे कहलाऊ ?



तुम हो 

मेरे मन का मोती ,

मेरे दिल की अगाध गहराईओं में छिपा

कौस्तभ ,

तुम्हारे गांव में

न था सागर

न था मेरु परबत

न था वासुकि नाग को खींचने वाले

देव और दानव

फिर भी ढूंढ़ निकाला

मगर पहेनु तो कैसे ?

कहाँ ?

ना है मेरे पास

मुगट मोहन का ,

और

बिना बांसुरी

तुम्हारा कहान कैसे कहलाऊ ?

'गर मेरी अखियाँ रोती

तो तुम देख पाती ,

जरा मेरे दिल के अंदर

झाँख के देखो

गमो के दरिया में

डूबा हुआ है

मोती
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Original Gujarati / 13 Oct 1979

Hindi Translation / 15 July 2015

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કૌસ્તુભ કાઢ્યું ગોતી

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મારા મનનું મોતી

તું ,

દિલ નો દરિયો ડોળ્યો


વાસુકી મેરુ ને ભરડ્યો ,

અગાધ ઉંડાણે થી

કૌસ્તુભ કાઢ્યું ગોતી :

પણ મોહન હું ના ,

મુગટ મને ના ,

ક્યાં પધરાવું ?

આંખડી મારી


છાનું છાનું રોતી .
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Monday, 13 July 2015

भर दू मांग तुम्हारी


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लहू से मेरे


सींची जो धरती ,


वहाँ खिलेगा


गुलाब का एक


पिला फूल ,


लगा के इसे


सवाँर दो


तुम्हारे काले बाल को ,


तब मैं मानु


करोगी पूरा


मेरे अधूरे ख्वाब को ,



मेरी जीवन संध्या के सिन्दूर से


भर दू मांग तुम्हारी

तब तो कबूलोगी

के


तुम्हारे अरमानो को


कर लिया मैंने


मेरे  ?


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Original Gujarati  /  13  Oct  1979

Hindi Translation  /  14  July   2015


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ભરી માંગ તારી

મારા લોહી થી જે
ધરતી સીંચી છે ,

ઉગશે ત્યાં
પીળા ગુલાબ નું એક ફૂલ  :

કાળા ભમ્મર કેશ માં તારા
ઝુલશે તો
માનીશ કે

મારા અધૂરા સ્વપ્નો ને
તું
કરીશ પૂરા  ;

મારી જીવન સંધ્યા ના સિંદૂર  થી
ભરી માંગ તારી ;

તારા કોડ પણ
હું
કરીશ મારા .

Sunday, 12 July 2015

बूज़ा के जाऊँगा

बूज़ा के जाऊँगा

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साकी ,

देख कौन आया
महफ़िल में तेरी
ये शराबी ,

करो ना सितम
सुधा से भरो ,
देख मेरा जाम खाली  !


बची ना शराब तेरे मयखाने में  ?

हो कर बेफिक्र
भर दे ज़हर से
मेरी जो
प्याली खाली  !


दीवाना प्यार का तेरा
लौटेगा नहीं

'गर  बूज़ा न शको
इश्क की प्यास

तेरे दर पे
बूज़ा के जाऊँगा
जिस्म की सांस  !


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Original Gujarati  /  13   Oct   1979

Hindi Translation  /  13  July   2015


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અરે ! બૂઝશે આજે

સુધા નો જામ ખાલી
સાકી સિતમગર ,

       શરાબ તારી ખૂટી જો ,
       ભરી દે બેફીકર થઇ
       ઝહર પ્યાલી  :

દિવાનો પ્રેમ નો તારો
પાછો જશે શું  ?

       અરે !
       બૂઝશે આજે ,

       કાં તો
       ઈશ્ક ની પ્યાસ
       યા તો
       જિસ્મ ની સાંસ .

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Thursday, 9 July 2015

नाखुदा !

नाखुदा  !

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आश लगाए बैठा हूँ 

अब तो अगले जनम 

पूरी होंगी 

बची हैं जो क्वहाहिशे ,

अब 

न तो है ख्वाब का जोड़ना 

ना ज़ंजीरों का तोड़ना ,

हम तो हार चुके सनम !


जिन्हे ना मिला हमसफ़र

उन्हें सहारा कैसा ?


मेरी कश्ती को 

ना मिला पतवार 

तुम्हारे आँचल का

तुम जो छोड़ गई मज़धार 

किसे मानु जीवन का आधार ?

बाकी बचा है खुदा 


उसे ही मान लिया है


नाखुदा !


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Original Gujarati / 15 Jan 1980
Hindi Translation / 10 July 2015
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ખુદા જ મારો નાખુદો .
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હવે આવતે ભવે ,
અધૂરાં ઓરતા
આશા ના નોરતા :

શ્રુંખલા ઓ સંસાર ની
હજુ
તોડવા મથું ના :

હાર્યા ને વળી હામ કેવી ?


તારા આંચલ નો
સઢ નથી તો શું થયું ?


મારી હોડી ને તો
હલેસું પણ નથી !


હવે તો
ખુદા જ મારો
નાખુદો .

Sunday, 5 July 2015

पलाश क्या बोले ?

पलाश क्या बोले  ?

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गुलमोर खिलते रहेंगे ,

लाल रंग केसूदा
पीले पलाश को पूछते रहेंगे ,

" कहाँ है वो गोरी  ?
  कहाँ है वो
  जिसने पहनी
  चुराके
  तेरे रंग की चुनरी  ? "

पलाश क्या बोले  ?

बैशाख की धुप में
पेड़ो की छावमे ,

सोई हुई हवा भी
क्षुब्ध ,
अति क्षुब्ध !

मेरी धरा को
आज बादलो ने घेरा

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Original Gujarati  /  26 April  1980

Hindi Translation  /  06  July  2015

Saturday, 4 July 2015

मेरे अंग अंग






अगर  कबूल भी करलूं 
की मैं तुम्हारे लायक 
नहीं ,

तो क्या कर पाओगी 
तुम्हारे प्यारसे अलग  ?

ये सच है की 
रात के अँधेरे 
मुज़से  मेरी छाया 
छीन लेते हैं ,

पर जैसे 
राधा के रंग में कृष्ण रंगा 
वैसे ही भीगे 
मेरे अंग अंग 
तेरी प्रीत के  रंग  ,

हो न पाया 
अनंग का संग 
तो क्या हुआ  ?

मैं तो तुम्हारे सांस में 
समाया  !

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Original Gujarati  /  28   April  1980

Hindi Translation  /  04  July  2015

Thursday, 2 July 2015

सुलगते है जो शोले


जो लिखा वो तो लोग पढ़ लेंगे

जो ना लिखा,

वो कौन जानेंगे ?

कैसे जानेंगे ?

कथा जो बनी व्यथा से 

और लिखी गई जो 

कटार की धार से ,

उसे कौन पढ़ेगा ,

कैसे पढ़ेगा ?


ये तो 

ज़माने की गलत - फहमी है 

की इसे बुज़ गए अंगारो की 

राख दिखती है !


राख के निचे 

सुलगते है जो शोले 

उसे कौन देखेगा ? 

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Original Gujarati / 19 June 1980 / Bangalore
Hindi Translation / 03 July 2015