Hi Friends,

Even as I launch this today ( my 80th Birthday ), I realize that there is yet so much to say and do.

There is just no time to look back, no time to wonder,"Will anyone read these pages?"

With regards,
Hemen Parekh
27 June 2013

Wednesday, 18 November 2015

आभास ही आभास है

कभी तो आया करो 
रूबरू ना ही सही 
सपनोमे तो भाया करो ;

छू  शको  ना जिस्म को मेरे 
रूह पर तो छाया करो  !

कैसी आश लगाए बैठा हूँ  !

जिस तरफ देखू वहाँ 
आभास ही आभास है  ;

मेरे निश्वाश से बने 
घने कोहरा में 
छिपा है वह ,
तेरा मेरा राज़ है  !

अगर साथ साथ चलते 
तो राज़ कैसे रहता  ?

दुनिआ की निगाहों से 
तेरे मेरे प्यार को 
कैसे छिपा पाते  ?

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19  Nov  2015  /  #



Wednesday, 11 November 2015

नया खेल : नया दाव



बहुत खेला ,  ओ ज़माना  ,

अब खेल कितना बाकी हैं  ?

कब तक करू ए लुकाछिपी ,

कितने दाव  देने बाकी है  ?

जब थक गया तब

करी कुछ बेइमानि ,
गिनती में कुछ बेवफा होके ,
गद्दारी भी खुद से करी  !

तो कभी चौराहे पर आकर

भूला भी कहाँ जाना है  ,
बस चलता रहा  !

किया , जितना कर पाया

किया , जैसा आया
कुछ भाया
तो ज्यादातर गवाया  :

नाचता भी रहा

जैसे तूने नचाया ;

अब बहुत हुआ ,

अब क्या बाकी है  ?

चलो मैंने मान लिया :


 " तुम जीते , मैं हारा  "


अब तो छोडो  !


अगले जनम में भी

कुछ दाव देना बाकी हैं  !

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Original Gujarati /  09  Aug  2014

Hindi Translation  /  12  Nov  2015 

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નવી ઘોડી , નવો દાવ

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ઘણો દાવ આપ્યો દુનિયા 
હવે કેટલો બાકી છે  ?

સાતતાળી રમતાં થાકયો દુનિયા ,

કર હજી 
કેટલો બાકી છે  ?

આળસી જઈ અંચી કરી 

ગણવાં મા પણ ગંચી કરી ,

ખપાવી પાંચને સાતમાં ,

ખુદને છેતરતો રહયો  :

સંસારની ભૂલ ભૂલામણી મા 

ભમતો રહયો  .

જેટલુ આવડ્યું તેટલુ કર્યુ 

જેવુ આવડ્યું તેવુ કર્યું 

ગમ્યું તે તો કર્યું 

પણ 
ના ગમ્યું તે પણ કર્યું 

નચાવ્યો જેમ તેં , નાચ્યો ;


હવે તો 

દાવ મારો , ઉતારી દે

" હાર્યો ? કબૂલ ? "  કહીને 

ઉગારી દે 

પછી 


કહેવું  હોય તો કહેજે 


" નવી ઘોડી , નવો દાવ "

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Monday, 9 November 2015

कुछ पल ऐसी भी आई

गया जो ज़माना
फिर वो आ नहीं शकता ,

आनेवाला है जो ज़माना
मेरे गुजरने  बिना
जा नहीं शकता  !

कुछ पल ऐसी भी आई
जो आजतक
जाने न पाई ,

अकेला ही सही
इन्ही के सहारे चला हूँ  ;

ना अब कोई
मँज़िलोंको ढूंढना है
ना कोई मोड़ पे मुड़ना है

बस चलते रहना है
कभी ना कभी
जब रास्ता ही रुक जायेगा
तब रुकना भी है  !

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09  Nov  2015  /  #

Sunday, 8 November 2015

क्या जवाब देती ?

अगर तुम पूछते ,
" मुज़े क्यों याद करते हो ? "

तो मैं क्या कहेता  ?
चुप ही रहेता  !

जैसे किसीने पूछा ,
" तुम सांस क्यों लेते हो ? "

मैं भी पूछ शकता हूँ ,

" तुम्ही बताओ ,
  तुम्हे कैसे भुलाऊँ ? "

तो तुम क्या कहेती  ?
क्या जवाब देती ?

या ,
शर्मसे आँखे ज़ूका लेती  ?

अगर तुम पूछती ,
" क्या तुम मुज़े प्यार करते हो ? "

तो क्या इकरार करता ?

या पलट के पूछता ,

"  तुमने किसीको चाहा कभी  ? "

तो क्या ,
अंदाज़ से  ही बता देती  ?

या
कुछ बोल भी पाती  ?

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09  Nov  2015 /  #

क्या राज़ हैं ?

क्या राज़ हैं  ?
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लोग पूछते है :
तुम्हारे ग़मोका क्या राज़ है  ?

मैंने कहा :
बतादू तो कैसे बचेगा राज़  ?

मुड़कर पीछे देखने की
हिम्मत नहीं मुज़मे ;

मेरे लिए  एक ही राज़ है :

जिस मोड़ पर तुम रुक गई
वहाँ क्यों न रुक पाया मैं  ?

क्यों चलते रहे मेरे कदम  /

लोगो  को  क्या कहूँ  !

उनके लिए जो राज़ है
वो तो मेरी
ज़िंदगी की
बची हुई आश हैं  !

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06 Nov  2015  #




Saturday, 7 November 2015

कौन थे तुम्हारे ?

कौन थे तुम्हारे  ?

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 थे जो कभी
तुम्हारी आँखके तारे
वो तो तुम्हे भूल पाये ;

कैसे भूलूँ मैं  ?

मैं तो हूँ
तुम्हारे अस्तित्व का
बचा हुआ
एकलौता बहाना  :

देखना चाहो तो
देखलो मेरी आँखोसे ,

कौन थे तुम्हारी
आँखके तारे ,
और कौन था
तुम्हारा
तकदीर का मारा  !

अब तुम्हे कुछ फर्क  नहीं ,
करे या ना करे
कोई याद ,

मुज़े फर्क हैं

मेरी यादों में
मेरे बचे हुए इन  सांसो में
तुम्हे ज़िंदा रखना हैं

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03  Nov  2015  /  #





Friday, 6 November 2015

तुम्हे कैसे भुलाऊँ ?

तुम्हे कैसे भुलाऊँ ?

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इन हवाओं में
कभी बहेते थे
तेरे मेरे इश्क के ख्वाब  ;

इन्ही हवाओं में
चुभती हैं आज
मेरे ग़मों की ख़ाक  ;

आज भी बुलाता हूँ तुम्हे

तुम्हारी छवि लेकर हर शाम
दिल को रूलाता हूँ  ;

खुद को बेखुद कर पाया
मगर
तुम्हे कैसे भुलाऊँ ?

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30  Oct  2015 #