Hi Friends,

Even as I launch this today ( my 80th Birthday ), I realize that there is yet so much to say and do.

There is just no time to look back, no time to wonder,"Will anyone read these pages?"

With regards,
Hemen Parekh
27 June 2013

Saturday, 27 February 2016

तुम्हारे ही गांव में

याद है वो सुब्हा
जब मिले थे हम
पहेली बार  ?

देखते ही
आँखों से आँख में ,
हो भी गया था प्यार  ?


कहो ,
मेरी सूरत में तूने क्या देखा ?

पूछना है तो पूछ लो ,
तेरी सूरत में
मैंने क्या देखा !

कहे नहीं पाउँगा ,
जलवा जो देखा
वो बयाँ से बाहर हैं  !

खुदा की भी क्या
होती है कोई पहचान  ?

आज भी
तुम्हारे ही गांव में
हो गया था
बस
वही प्यार हैं  !

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28  Feb  2016


Friday, 26 February 2016

तब शिकवा किस से करे ?

तुम खूब जानती थी ,

मैंने अगर गद्दारी की
तो खुद से ,
ज़माने से नहीं ,

मैं भी जानता था
तुमने जो वफ़ा जताई

ज़माने से ,
ना खुद से  !

हमने तो
तन्हाईओं के अँधेरे में
छिप छिप के
तुम्हारे अश्क के जाम पिए हैं  !

चराग दिल के जलाके
कबीलो  की महफिलों को
रोशन किये हैं  !

चराग अब बुज़ने चला ,
तेल गमो का
कुछ कम बचा  ,

तब शिकवा किस से करे  ?

बहेरा ज़माना ,

जब सुन शका ना तेरे पायल की  झंकार
वो  गीत मेरे क्या सुन पायेगा  ?

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27   Feb   2016  /  #



Tuesday, 23 February 2016

अगर मिला कोई राह में

अकेला आया था 
अकेला जाऊंगा ,

बीच में थी लम्बी राहे 

अगर मिला कोई राह में 
तो 
कुछ कदम भी चले 
साथ साथ में  ;

हँसे भी 
तो कभी रोये भी  !

एक के बाद एक 
जो मिले थे 
वो बिछड़े भी ,

तुम बिछड़े 
मगर तुम्हारी याद से हम 
कैसे बिछड़े  ?

उसी के सहारे तो 
चला जाता हैं  !

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24  Feb  2016  /  #

Saturday, 20 February 2016

क्या जवाब दू ?

तुम्हारी आँखों में जांक के देखा
वहाँ सूरत मेरी थी ,

मेरी आँखों में तुमने क्या देखा
वो तो बताओ  !

अब , मैंने तो आयना  तोड़ दिया है  !

लोग पूछते हैं ,

" क्यों गीत गाना छोड़ दिया  ? "

क्या जवाब दू  ?

तुम्हारा नाम लेके
गुनगुनाना तो नहीं छोड़ा  !

मुरादों की मज़ार पर
गमो के गुल चढ़ाना तो नहीं छोड़ा  !

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21  Feb  2016 /  #

Thursday, 11 February 2016

कहाँ से कहाँ पहुंचे ?

कुछ वादे निभाये ,

कुछ कस्मे ऐसी भी खाई 
जो निभा न पाये  !

कहाँ से कहाँ पहुंचे  ?

जैसे 
रास्ता कुछ तय न कर पाये  !

तुम्हारी आँखों में 
कुछ मस्ती थी ,

जरुरत से ज्यादा 
कुछ शरारत भी थी  !

भूलना चाहा  तो 
बार बार 
वही याद आई  ;

क्या ,
यहां से भी बहारे 
कभी गुजरी थी  ?

रेत के रण में 
बदरिया कभी बरसी थी  ?

न तुम्हारा गुनाह था 
न मेरा ;

क्या प्यार से बचके रहना 
हमारे बस में था  ?

तुम फ़िक्र मत करना 
तुम्हारे राज़ को मैंने 
दामन में छिपा रख्हा है 

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02  Feb  2016

Tuesday, 9 February 2016

अगले जनम में मिलोगी ?

पिछले जनम में 
तू मिली थी या नहीं ,
मुज़े याद नहीं  !

अगले जनम में मिलोगी  ?

ए आश है 
अहेसास नहीं  !

इस जनम में मिली 
ये क्या काफी नहीं  ?

दो कदम साथ साथ चली 
ये क्या काफी नहीं  ?

जो नसीब ना हो शके 
करोडो के ,
मुज़े वो मिला ;

अब तुम्हारे आँचल की छाँव में 
सोना चाहता हूँ 

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28  Jan  2016


Monday, 8 February 2016

क्या क्या लिखना चाहूं

खूब छिपा के रख्हा है राज़ 
तेरे मेंरे प्यार का  ;

जो सच ना हो पाये 
ऐसे 
सपनोके संसार का  ;

सुबह  होते ही 
सपने बिखर जाते हैं ,

फिर 
रात की आश में 
दिन भी कट जाते हैं  ;

लोग पूछते हैं ,

" दिल में कौन सा दर्द 
छिपाए रख्हा हैं  ?

बिरह के गीत क्यों 
बार बार गाते हो  ?  "

उन्हें क्या बताऊँ  ?

तुम्हारी छवि के सामने 
बैठ कर ,
क्या क्या लिखना चाहूं 
मगर लिख ना पाऊं  !

सोचता हूँ ,
क्यों मेरे कदम लड़खड़ाये  ?

अब फांसले बढ़ते जाते हैं  !

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27  Jan  2016