Hi Friends,

Even as I launch this today ( my 80th Birthday ), I realize that there is yet so much to say and do.

There is just no time to look back, no time to wonder,"Will anyone read these pages?"

With regards,
Hemen Parekh
27 June 2013

Monday, 30 May 2016

टूट रहे है बिना के तार

ना कोई पास 
न कोई आश ,

जहाँ देखू वहां 
धुंधला सा आभास  !

काश  !
मैं कोहरा हो के 
तुम्हे छू लेता ,
बाँहों में मेरी 
तुम्हे लिपट लेता  !

कहो ,
कौन सा गीत गाउ  ?
किस राग में बुलाऊँ  ?

लिखे जो गीत तुम्हारे लिए 
किस कदर सुनाऊं  ?

अब मेरा साज 
बेसुरा बन चला है  !

एक एक कर 
टूट रहे है बिना के तार  ;

ठहरो ,
तुम्हारे पास 
बिना को तो यहीं छोड़ के 
आना है  !

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31  May  2016

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Sunday, 29 May 2016

मेघधनू बन खिंच गए

वो भी क्या बैशाख था 
जब तुम बादल बन के आयी ,

दिल की मेरी मरूभोम में 
बहार बनके छायी  !

बिन बरखा के 
फूल खिल गए 
और 
मेरी आँखों से बरसे जो रंग ,
दामन में तुम्हारे, 
मेघधनू बन खिंच गए  !

मेरे दो हाथ के बीच 
क्यूं थम गया था 
तुम्हारा हाथ  ?

और 
तुम्हारे दुपट्टे ने 
क्यों छोड़ा दामन का साथ  ?

बाली उम्र की तुम्हारी नज़ाकत 
आज भी 
नज़रों के सामने है  !

बैशाखी तो बहुत आयी और गयी ,
खिले कुछ गुल भी ,

वो भी 
तुम्हारे ज़ुल्फो की याद दे के 
मुरझाये  !

मेरी तन्हाइयो 
तुम्हारे सूरोसे 
अब भी भर जाती है  !

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30  May  2016

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Tuesday, 24 May 2016

तुम्हे खोजता रहता हूँ

जो पल कल थी 
क्यों वही मन को भाती है  ?

वो तो 
फिर से ना आने वाली है  !

इस लिए के 
जो आयेगी कल 
वो भी तो जानेवाली है  ?

आज में ही उलजने की 
कोशिश तो खूब करता हूँ ,

बिते हुए दिनों को भुलाने की भी 
उम्मीद रख कर चलता हूँ ;

फिर बार बार 
अतीत में डूब कर 
तुम्हे 
खोजता रहता हूँ 

उस अतीत जिसे 
भूल कर भी ,
ना भूलना चाहता हूँ  !

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25   May   2016   /   #

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Sunday, 22 May 2016

अच्छा हुआ

चलो , ये भी अच्छा हुआ 
न कोई समझा , न पूछा ,
राज़ को राज़ ही रखहा  ;

पूछते तो क्या कहता  ?
यही के ,
तुमसे मुझे प्यार है  ?

अच्छा हुआ 
किसी ने ना शरमाया ;

ना किसी ने मेरी आँख में 
जांख के देखहा  ;

देखते तो ,
तुम्हारी छवि को 
कैसे छुपाता  ?

तुम्हारी तरह 
आँखे तो 
बंध न कर पाता  !

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22   May   2016

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Thursday, 19 May 2016

वादे तुमसे थे

लोग पूछते है ,
" मायुश क्यों ? " ,

कभी तो , कोई पूछा करो ,

" अब भी , ज़िंदा क्यों  ? 
कौन सा बहाना बनाये हो  ? 

ना कोई क़र्ज़ चुकाना है 
ना कोई फ़र्ज़ निभानी है  !

क्या किसीको 
कोई वादे किये थे ?  "

जैसे के ,

" मैं ज़िंदा रहूँगा,
जब तक रहूँगा 
तुझे याद  करूँगा ,
रब को फ़रियाद करूँगा "

वादे तुमसे थे ,
ज़माने से नहीं  ;

पूछने दो लोगोको ,

जवाब उनसे नहीं 
तुमसे देना है 

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20  May   2016  /  Mumbai

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Wednesday, 18 May 2016

खामोश है हम

जीवन के जल 
बहते जा रहे थे  ;

अभी कौन उठी इस दिवार पथ में 
पतथरो की 
रोकती हमे  ?

अट्टहास्य से 
हमारी खामोशी को ललकारती  ;

खामोश है हम 
इसे क्या पता 
उस दिन के लिए ,
बादलों के घेरने के लिए ,

जब बाढ़ आ जायेगी प्रचण्ड रूप से ,
जवानी हमारी बांध ना पायेगी  ;

दीवारे तोड़के 
गाते , हँसते 
बह देंगे फिर 
जल जीवनके  !

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03  March  1959  / Mumbai 

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बिना देखे जलवा तुम्हारा

ये तो न था मेरा अफ़साना 
की ,
शमा जलती रहे 
और 
पहुँच न पाये परवाना  !

ये कैसी महफ़िल  ?

सूरा लेकर खडी है साकी ,
मिला न कोई 
पिने वाला दीवाना  !

मुरादों का क्या 
जब मंज़िले भी 
बदल गयी मज़ारो में  !


ना हम हटने वालों में से ,
बिना देखे जलवा तुम्हारा 
लौटेंगे नहीं ख्यालों में ;

पिला न शकोगी सूरा ख्यालों में  ?

रहने भी दो  !

कोई सुरीला गान ही सुना दो 
सोने का वक्त आ चला हैं  !

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19  May   2016

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Sunday, 15 May 2016

क्यों न कहे शका

सुबहा होते ही सवाल उठते है ,
आज क्या करना हैं  ?

फिर शाम ढलने पर 
खुद को ढंढोलता  हूँ ,

क्या करना था 
और 
कर बैठा क्या ?

तुम्हारे आने के पहिले 
ना तो कोई सवाल था 
ना कोई जवाब ;

तुम्हारे जाने के बाद 
मानो 
सवालों की बरात है  !

सवाल भी मेरे 
और जवाब भी मेरे  !

कुछ शिकायत भी  है 
खुद से ;
क्यों न कहे शका 
तुमसे प्यार हैं  ?

आज भी 
मेरी वफाओं को 
तुम्हारा इंतज़ार हैं  !

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16   May   2016  /  #

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Saturday, 14 May 2016

पर खयालो वही है

तुम्हारे रास्ते से गुजरा 
तो क्या पहचान पाओगी  ?

देख कर सफ़ेद बालों को 
धोखा तो न खाओगी  ?

देखती रहती हो जिसे 
सपनो में ,
वो पुराना प्रितम 
ज़रूर कुछ बदल गया है  ;

लकीरे जो हाथ में थी 
वो अब 
चहेरे पर भी ,
साफ़ नज़र आती है  !

बदन कुछ झुका हुआ है ,
आँखे नमी है ,
रफ़्तार में कमी है ,

पर खयालो वही है  !

चाहिए सबूत  ?

लगाके तुम्हारे कान 
सिने  से मेरे ,
सुनो  !

तुम्हारा नाम लेकर 
चल रही है जो ,
धड़कन वही है  !

और कह रही है ,

" प्रिया ,
तुम भोली हो ,

मुझे बालों से नहीं 
दिल से पहचानो  "

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15  May  2016   /   #

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Friday, 13 May 2016

न सोचा अंजाम क्या होगा

लिखा जो था
विधि ने लेख 
ललाट में तेरे
न देखा मैंने ,

सिर्फ चूमा ;

ना सूनी  तूने 
कहे रही थी  क्या 
मेरे हाथो  की लकीरे ,

सिर्फ चूमा   :


न सोचा
अंजाम क्या होगा 
उस सफर का 
जहां  हमसफ़र 
साथ ना होगा  !


ना देखि कोई मंज़िले 
बस चलते रहे ,
कहाँ जाके रुकेगा रास्ता 
क्या था , उसका पता  ?


अकेला रहकर 
अब भी चलता हूँ ,
होनी में लिखा था जो 
उसकी कहानी 
लिखता हूँ ;

गिरे जो तुम्हारे ज़ुल्फो से 
उठाके उन फूलों को 
गीत गाता हूँ ;

अच्छा ही रहा 
न हमने देखा 
लिखा था जो 
ललाट में तेरे 
और हाथ में मेरे  !

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14  May   2016  /   #

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Wednesday, 11 May 2016

मैं अब शोर के काबिल नहीं ,

हम तो यूँही बह गए ;

निकले थे 
तुम्हारी आँख के आंसू बनके ,

तुम्हारे ओठों तक 
पहुँचने से पहेले ही 
सूख गए  !

क्या तुम्हारा चहेरा भी 
रेगिस्तान होता जा रहा है  ?

अगर मेरे गमो की नदी 
सूख जाएंगी 
तो ,
तुम्हारे उजड़े हुए चहेरे को 
कहाँ धो पाओगी  ?


मैं अब शोर के काबिल नहीं ,

क्या करोगी सुनके 
मेरे मिटने तक का 
सन्नाटा  ?

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Lucknow  /  15  March  1989

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आओ , पकडलो हाथ

आवारपुर  उठो  ,

अभी तो बहुत लम्बी सफर बाकी हैं  
क्यूंकि 
अभी भी तुम्हारी छावं में 
बैलो की जगह  खेत में ,
 बच्चे जूते जाते हैं  !

तुम महान हो ,
तुम्हारे कंधो पर 
देश की जिम्मेवारी हैं  ! 

तुम्हे देखना है की 
तुम्हारे पुर्जे कभी बंध हो न पावे  ,
तुम्हारी मशीने 
कभी सो न जावे   !

मगर इन ऊंचाईओ से 
जिसके कंधे पर तुम खड़े हो ,
उनकी आवाज़ भी तो सुननी है  !

तुम्हारी छाव में अभी भी ,
कई  माँ ए 
बच्चे को रोटी के बदले 
कहानी सूना के सूला देती है  !

तुम्हे अभी 
लम्बी सफर तय करनी है  !

आओ , पकडलो हाथ 
बिना जिनके साथ ,
तुम अकेले चल नहीं पाओंगे  ;

तुम्हारे जो हमसफ़र है 
उन्हें छोड़के 
क्या आगे बढ़ पाओंगे  ?

सुनहरी कल के सपने 
देखने वालो , हम सब है  ;

रात भर सोनेवाले भी 
हम सब है  ;

उठो , भयी भोर 
और चल दो 
इक नयी क्षितिज की और  !

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05  March  1986  /  #

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क्या इसमें ही भलाई हैं

तेरी मेरी 
क्या इसमें ही भलाई हैं 
की ,

मेरा आवाज़ कभी 
तुम्हारे कानो तक पहुँच ना पाये  ?

तेरे रूप को तरसती 
मेरी इस आँखों पर 
सदा अन्धेरा छा जाए  ?

ये मेरी उंगलियों को 
कुचल कर 

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Incomplete Original dated :  31  July  1977 

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Sunday, 8 May 2016

कुसूर क्या था मेरा ?

जब तुम्हे पता था 
ज़माने का दस्तूर ,
तो क्यों मिलायी 
आँखे मुज़से  ?

काश ,
तुमने मुख मोड़ लिया होता  !

कहो इसमें 
कुसूर क्या था मेरा ?

मैं तो 
तुम्हारी आँखों के 
अथाग सागर में डूबा था ;

आज भी 
उन्ही आँखों में आँखे डाल कर
खुद को भूल जाता हूँ  !

'गर , 
तुम और मैं ,
ज़माने के दस्तूर से डरते 
तो कैसे बन पाती 
कहानी हमारी  ?

फानी बन कर रह जाती  !

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09  May  2016  /  #






Saturday, 7 May 2016

क्या क्या बताऊं ?

कभी कभी 
सोचता हूँ ,
गुनाह मेरा क्या था ?

प्यार ना किया ?
वो तो ना था  !

प्यार करके 
इकरार ना किया ?
बेशक , वही था  !

जो राह की 
तुम रहनुमा थी ,
उस राह पर ना चला  ?
वो भी था !

लिखा जो 
वो कहे न पाया ?
कुछ कहा भी तो 
कर न पाया ?

गुनगुनाया 
पर गा न पाया  ?

गमो को सराहा 
पर जिस्म को 
छु न पाया  ?

क्या क्या बताऊं  ?

होनी को अनहोनी 
कैसे कर पाऊं  ?

तुम्हारी याद लेकर 
जिए जाता हूँ ,
क्या वो सज़ा काफी नहीं  ?

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08  May  2016  /  #