Hi Friends,

Even as I launch this today ( my 80th Birthday ), I realize that there is yet so much to say and do.

There is just no time to look back, no time to wonder,"Will anyone read these pages?"

With regards,
Hemen Parekh
27 June 2013

Thursday, 6 October 2016

मानो बहारे भी रुक गयी !

जब तक तुम आयी 
तब तक अन्धेरा था ,
रातों में मेरी 
तन्हाईओं का बसेरा था  ;

आने से तुम्हारे 
सुबह आयी ,

अँधेरे दिल के हटाके 
हर कोने में ,
तुम्हारे प्यार की 
रौशनी छायी  !

मानो बहारे भी
जिभर के तुम्हे देखने 
जैसे रुक गयी  !


शिकवा है तो ये की 
फासला  निगाहों का 
क्यों बना रखा  ?


अब आँखों से उलझ गयी हो 
तो कैसे समजाऊँ ,
तुम्हारा नाम लेते ही ,
दिलमे ,
हज़ारो चराग 
जल उठते हैं  !

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07  Oct  2016

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Tuesday, 4 October 2016

कौन समजेगा

मेरी आह को आवाज़ नहीं ;

ज़माना ने देखि हंसी ,
कैसे देखता आंसू 
जो बह न पाए  ?

कैसे सूनता दर्द 
जो हम कहे न पाए ?

कौन समजेगा 
हमारी खामोशी को  ?

'गर होती नहीं 
तुम्हारी रूश्वाई 
तो भी क्या कहते ?


शिकायत है तो उस खुदा से ,
मिलने ना दिया 
दिन के उजाले में 
तुम्हे ,
ख्वाब में क्यों न 
आने दिया  ?

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04  Oct  2016

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