Hi Friends,

Even as I launch this today ( my 80th Birthday ), I realize that there is yet so much to say and do.

There is just no time to look back, no time to wonder,"Will anyone read these pages?"

With regards,
Hemen Parekh
27 June 2013

Friday, 23 December 2016

कैसे दौड़ आती ?

क्या कभी 
छवि मेरी चिपकाके दामनसे ,
कहा ,

" अगर तू है 
  कृष्ण राधे का ,
  तो 
  मैं भी हूँ राणा की मीरा 

  मैंने भी पिया
  लेकर तेरा नाम 
  ज़हर का प्याला ;

  फर्क था तो इतना ,
  न किसी ने कहा ,
    मीरा प्रेम दीवानी ,

   ना जानी किसीने 
  तेरे मेरे 
  प्रेम की कहानी ;

  सून के तेरी बांसूरी 
  कैसे दौड़ आती ?

  ज़माने की जंजीरे 
  कैसे तोड़ पाती  ?

  अगर लिखा था भी 
  मेरे भाग में 
  दूर से तड़पना ,
  तो क्या हुआ  ?

  छवि तेरी 
  दामन से लगी हैं  "

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24  Dec  2016

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Friday, 16 December 2016

आज भी अफ़सोस है

यही महानगर की 
समंदर से  लगी 
एक गली में ,
चलके साथ साथ 
एक शाम 
तूने कहा था ,
" तू खूब सुन्दर लगता है "

आज भी अफ़सोस है ,
सिवा की ,
" तू भी "
कुछ और क्यूँ 
न कह शका ?

अब ये शोच के 
मन को मना लेता हूँ ,
जलवा जो देखा था उस शाम ,
कौन से लब्ज़ में 
बयाँ कर पाता ?

और ये भी तो है 
तेरे ख्यालों
इस जहां के 
कौन से शब्दो में 
समा पाते  ?

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17  Dec  2016

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Thursday, 15 December 2016

जानते हुए भी क्यों पूछा ?

गयी रात , गयी बात 
जब सुपनोंमे आके 
तुमने पूछा ,

"  आओगे मेरे साथ  ?
    दूर दूर ,
    जहाँ  धरती
    आकाश से मिलने 
    खुद अपना अस्तित्व मिटा देती है ,

    जहाँ आकाश 
    धरती से मिलने 
    क्षितिज की बाहों में 
    लिपट जाता हैं ;

    दूर दूर जहाँ 
    ज़मानों से दूर ,
    हम दोनों 
    खुद को मिटा के ,
    बेखुद बन पाएंगे  ?  "

क्यों पूछा ?
जानते हुए भी क्यों पूछा ?

जागते हुए जो 
तुम्हे लेजा  ना शका 
उम्बर के उसपार ,
वो भला 
सुपनोंमे 
क्षितिज को कैसे छु पाता  ?

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16  Dec  2016

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Wednesday, 14 December 2016

तुम्हारी बात तुम जानो

क्यूँ खामोश हो  ?

क्या कहे चुकी हो 
जो कहना था  ?

मुझे क्यों 
ऐसा लगता है 
जैसे तुम कुछ कह न पायी  ?


तुम्हारी बात तुम जानो,
मैं तो कह बिना रह नहीं शकता ;


एक ही बात 
सौ बार ,
दोहराये बिना रह नहीं शकता ;


जानते हुए भी 
मेरी बात तुम्हारे 
कानो  तक 
पहुँच न पायेगी ,
मेरे गीत 
तुम न सून पाओगी ,
न मेरी  कविता 
तुम पढ़ पाओगी ;

खुद अपने आप से 
बातों करने की 
मैंने आदत बना ली हैं  !

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15  Dec  2016

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Friday, 9 December 2016

मैं तुम्हारी क्या लगती हूँ ?

एक ज़माना हो गया 
तुमने जब 
तय कर लिया ,
मैं तुम्हारा क्या लगता हूँ  ,

पूछके ,
" तुम मेरे प्यारे हो ना ? " ;

क्यों न पूछा ,
" मैं तुम्हारी क्या लगती हूँ ? " 

शायद तुम्हे 
पूछने की जरुरत ही 
ना लगी  !

शायद तुम्हे याद आ गयी 
कई 
अगले जनम की बात ,
जब 
मजनू ने लैला को 
फरहाद ने शिरीन को 
मेहवाल ने सोहनी को 
वीजाणंद ने शेणी को 
कहा था ,

" तुम मेरी प्यारी नहीं ,
   मेरे प्राण हो "

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10  Dec  2016

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Sunday, 4 December 2016

क्यों न कहे दे इन्हें

झरूर होंगे ;

मेरे सिवा भी 
तुम्हे चाहने वाले 
बहुत होंगे  !

मुझे भी तो थे 
मेरे भी 
कुछ  चाहने वाले  ;

पर इकरार करने वाली 
एक तुम्ही थी  !

मेरे सिवा 
तुमसे क्या 
किसीने किया इकरार  ?

अनेको के प्यार से तो ,
मुझे प्यारी है 
तुम्हारी रूश्वाई  !


 क्यों न ऐसा करे ,
तुम्हारे चाहने वाले को 
मेरे चाहने वालो से 
मिला दे  ?


क्यों न कहे दे इन्हें 
छोड़ दे हमें अकेले  ?


मुझे कहेनी है तुमसे ,
लबों पर आके 
अटक गयी है जो  
हज़ार बाते ,

जो सह न शकु 
तन्हाईओं में अकेले 
वो हज़ार बाते ,

तुम्हारे और मेरे 
वो अनजान चाहने वालो से 
छूपा के रखनी है 
वो हज़ार बाते  !

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05  Dec  2016

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