Hi Friends,

Even as I launch this today ( my 80th Birthday ), I realize that there is yet so much to say and do.

There is just no time to look back, no time to wonder,"Will anyone read these pages?"

With regards,
Hemen Parekh
27 June 2013

Tuesday, 31 January 2017

वो क्या वार था ?




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गर्मियों के उस दिन आके 
तूने मेरा हाथ पकड़ा 
और कहा ,

" चल ,
   तुझे ले चलू मधुबन में ,
   बृंदाबन की कुञ्ज में 
   तू ही मेरा कृष्ण ,

   राह तकती थी जो तेरी 
   मैं हूँ तेरी वो गोरी ,
   राधा "

सुन कर 
बांसुरी के सुर 
मैंने छेड़े -

तेरा हाथ 
अभी मेरे हाथोमें 
लिए हूँ ,

आँखों में तेरी ,
उरनम मेरी 
आँखों पिरोये 
हुए हूँ :


जिन गर्मियों के दिन 
तू आयी 
वो  क्या वार था ?

मैं तो इतना जानू 
मैं तेरा शुक्रगुज़ार हूँ !

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01  Feb  2017  







  
  

Sunday, 29 January 2017

क्यों चल दिए महेफिल से ?



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आगे भी बेकरार था ,

फिर तुम मिली ,

बेकरारी को मानो ,
खूबसूरत 
एक बहाना मिल गया  !

जैसे 
भटके हुए राही को ,

मंज़िल का 
ठिकाना मिल गया  !

सोये हुए 
दिल के साज़ से 
तरन्नुम उठे ;

याद है , मैंने क्या कहा था ?

"  कहे भी दो ,
   तुम्हे क्या मिला ? "


बताये बिना 
क्यों चल दिए महेफिल से ?

मेरी बेकरारी 
तो 
अब भी कायम है !

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30  Jan  2017



Wednesday, 25 January 2017

तो चट्टानें पिघल जाएगी



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अतीत में कुछ पल
जैसे थम गयी है ,

हिमालय के शिखर पे
बर्फ जैसे जम गयी है;

हर पल को पीछे छोड़के 
चलता रहा,

मुड़ कर देखने की 
हिम्मत नहीं ,

अगर देख लू 
तो चट्टानें पिघल जाएगी 
थमी हुयी पले 
आंसू बनके 
बह जाएगी  ! 


कभी बहार  भी आयी ?

क्यूँ लगता है ऐसा ,
आने से पहले ही
मुर्ज़ाई  ?

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26  Jan  2017


Thursday, 19 January 2017

क्या तुमने कभी चाहा ?



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मेरे जाने के बाद 
करेगा कोई मुझे याद  ?

ये तो हुई 
बेकार की बात  !

क्या तुमने कभी चाहा  
लेकर तुम्हारा नाम,
ज़माने में कभी 
हो भी जाये 
कोई बदनाम ?

मेरे लिए तो 
यही बची है 
काम की बात  !

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20  Jan  2017



Wednesday, 18 January 2017

चाहत को कैसे छिपाऊँ ?



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एक उम्र की आहत को 
छिपाये चला हूं ;

चाहत को 
कैसे छिपाऊँ  ?

चार बिस और चार के 
चौराहे पर ,
अब न लेना 
कोई मोड़ है ,

न अफसानो की  
कोई होड़ है  ;

सुबह होने से पहले 
शाम ढल जाती है ,

फिर रात में ,

तुमसे अधूरी बात में 
सुबह हो जाती है  :

ज़रूर 
फांसला कुछ कम  होता चला है ,

शायद 
इसी आश में, 
गम भी 
कुछ कम सताता है  !

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19  Jan  2017







Thursday, 12 January 2017

गिला तक़दीर से है




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जानती हो  ?
मैं दीवाना बन पाता ,
तुम्हारे एक लब्ज़ की कमी थी  !

जिस दिन मिले पहेली बार 
तुम्हारे गांव की गली में ,
क्यों न कह पायी ,
" मुझे है तुमसे प्यार "  ?

बिना सूने 
मैं भी कैसे कह पाता ,
"  हाँ , अब तुमी हो 
    दिल की यार  "

गिला तक़दीर से है ,
एक दिन की ही तो बात थी 
सयाने से दीवाना 
क्यों न किया  ?

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13  Jan  2017

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Sunday, 1 January 2017

बहारे तो बहुत आयी




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मुझे याद है 
उम्र की तवारिख में लिखा वो दिन 
ग्रीष्म का वो पहला पहला दिन ,
जब मैं 
दिल में विरानो लेकर 
तेरे घर पहुंचा ,


तब तू 
बहार  बन के 
आँखों से उतरके 
दिल में छा गयी ;


आज भी 
तुम्हे देखना चाहता हूँ 
तो आयने के सामने जाके 
खड़ा हो जाता हूँ ;


ख़ुद अपनी ही आँखों में 
जांखता हूँ  !

ग्रीष्म के उस दिन से लेकर ,
बहारे तो बहुत आयी 
बादलो भी बहुत बरसे,


मगर 
मेरी पुरानी  आँखों में
बसी है जो ,


वो तो आज भी 
बिस साल से 
कुछ कम ही है  !

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02  Jan  2016

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